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स्वधर्मे निधनं श्रेयः — वर्णाश्रम धर्म की जागृति
आचार्य शंकर भारत उद्भासक मंडल

अपने अधिकार और विधान की सीमा में ही धर्माचार कल्याण-प्रद सिद्ध होता है; परमात्मा श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में इस तथ्य की पुष्टि 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' कहकर करते हैं। अतः जिस प्रकार सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म में चार वर्ण और चार आश्रम में मानव जीवन नियोजित है, उसी प्रकार धर्माचार का निरुपण भी इन्हीं वर्णाश्रमों के अनुसार किया गया है।
अतएव अपने अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार धर्म का पालन ही स्वधर्म होता है। अस्तु, मण्डल वर्णाश्रम धर्म की जागृति तथा उसके अनुपालन पर विशेष बल दे रहा है।
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