
स्वधर्मे निधनं श्रेयः — वर्णाश्रम धर्म की जागृति
आचार्य शंकर भारत उद्भासक मंडल
अपने अधिकार और विधान की सीमा में ही धर्माचार कल्याण-प्रद सिद्ध होता है। परमात्मा श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं — स्वधर्मे निधनं श्रेयः।
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[ यतो धर्मस्य ततो जयः ]
आदिशंकराचार्य के आदर्श पर सनातन धर्म का शास्त्रीय उद्भासन · लखनऊभगवत्पाद आदिशंकराचार्य के आदर्श पर सत्य सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म का शास्त्रीय उद्भासन · केंद्रीय कार्यालय लखनऊ
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शिवावतार भगवत्पाद आदि शंकराचार्य
शास्त्र-सम्मत लेख — प्रत्येक लेख में शीर्षक, लेखक और चित्र। मण्डल की वाणी को प्रभावी रूप से पढ़ें।

आचार्य शंकर भारत उद्भासक मंडल
अपने अधिकार और विधान की सीमा में ही धर्माचार कल्याण-प्रद सिद्ध होता है। परमात्मा श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं — स्वधर्मे निधनं श्रेयः।

शंकरवाणी संपादकीय
कलियुग में जब नास्तिकता चरम पर थी, तब शिवावतार भगवत्पाद आदिशंकराचार्य वैदिकधर्म भास्कर के रूप में प्रकट हुए।
सत्य सनातन वैदिक आर्य हिन्दू धर्म के शास्त्रोक्त यथारूप का प्रचार — भगवत्पाद आदिशंकराचार्य के आदर्श पर।

[ दिव्य यात्रा · DIGVIJAYA ]
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः
भगवत्पाद आदिशंकराचार्य की जीवन-यात्रा — कलडि से केदारनाथ तक — केवल एक महापुरुष की कथा नहीं; सनातन धर्म के पुनरुत्थान का दिव्य आख्यान है। सात पड़ावों में वह प्रकाशमय पथ।
०१ · कालाड़ीकेरल · जन्मभूमि
दिव्य जन्म
केरल की पवित्र भूमि कालाड़ी में भगवत्पाद आदिशंकराचार्य का अवतरण हुआ — वह ज्योति जिसने अद्वैत वेदान्त की ज्योतिर्मय धारा जगाई। माँ आर्यम्बा और शिवगुरु के घर में जन्मा यह बालक बाल्यावस्था में ही शास्त्रों का सागर था।
०२ · नर्मदामध्य भारत · दीक्षा
गुरु की शरण
नर्मदा के पावन तट पर गोविन्द भगवत्पाद से संन्यास दीक्षा ग्रहण कर उन्होंने संसार को त्याग दिया। यहाँ से आरम्भ हुई वह यात्रा जो ज्ञान के लिए नहीं — ज्ञान को जगाने के लिए थी।
०३ · काशीउत्तर प्रदेश · ज्ञानपीठ
अद्वैत की घोषणा
काशी की पवित्र गलियों में उन्होंने अद्वैत का सिंहनाद किया — एक ही परम सत्य, अनेक रूपों में। मण्डन मिश्र जैसे महान् विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्होंने वेदान्त की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की।
०४ · बद्रीनाथहिमालय · भाष्यभूमि
शास्त्र का प्रकाश
हिमालय की शान्ति में ब्रह्मसूत्र भाष्य, गीता भाष्य और उपनिषद् भाष्य रचे गए। कठिन शिखरों पर बैठकर उन्होंने वेद-वाणी को सरल और शाश्वत भाषा दी — जो आज भी संसार को प्रकाशित करती है।
०५ · श्रृंगेरीकर्नाटक · दक्षिणाम्नाय
धर्म की नींव
श्रृंगेरी में दक्षिणाम्नाय शारदा पीठ की स्थापना कर उन्होंने सनातन धर्म को संस्थागत रूप दिया। चार दिशाओं में चार आम्नाय मठ — ताकि ज्ञान की ज्योति कभी बुझे नहीं।
०६ · दिग्विजयभारतवर्ष · चार दिशायें
भारत का परिक्रमण
द्वारका से जगन्नाथ पुरी, ज्योतिर्मठ से कन्याकुमारी — उन्होंने समूचे भारतवर्ष का दिग्विजय किया। प्रत्येक स्थान पर शास्त्र, भक्ति और एकता का बीज बोया। यह यात्रा केवल भूगोल की नहीं — चेतना की थी।
०७ · केदारनाथउत्तराखण्ड · समाधि
अनन्त में विलीन
केदारनाथ की दिव्य हिम-शान्ति में भगवत्पाद ने देहत्याग कर परमब्रह्म में लीन हो गए। शरीर समाप्त हुआ — पर उनकी वाणी, उनके पीठ और उनका अद्वैत आज भी जीवित हैं।
[ स्मरण ]
शंकरं शङ्कराचार्यं केशवं बादरायणम्। सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः॥
उनकी यात्रा समाप्त हुई — पर उनका प्रकाश अनन्त है। हम उसी ज्योति के आदर्श पर चलते हैं।

सुरजापुर (पाण्डेय पुरवा), मनकापुर, गोंडा में परिकल्पित गौसेवा परियोजना — गौशाला, निराश्रित गौ आश्रय, गौ चिकित्सा केंद्र एवं भगवती सुरभि मंदिर।

शिवलोकवासी श्रीराम अवस्थी जी की पुण्य स्मृति में संचालित गुरुकुल — वैदिक वाङ्मय एवं आधुनिक विद्या का समन्वय।

भगवत्पाद आद्यगुरु शङ्कराचार्य भगवान के जन्म के 2414 वर्ष बाद 19 वीं शताब्दी में अभिनवशङ्कर पदवाक्यप्रमाण पारावारीण, अष्टांग योगनिष्ठ विश्वविश्रुत महामनीषी। कर (हाथ) ही जिनके भोजन लेने का पात्र हैं — आजीवन एक वस्त्रधारी, गंगाजलसेवी, आजीवन धनस्पर्श किये बिना धर्म का प्रचार प्रसार करने वाले।

आप पूज्यपाद धर्मसम्राट स्वामीश्री करपात्रीजी महाराज के शिष्य और पूज्यपाद श्रीमज्जगदगुरु पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामीश्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज महाभाग के विशेषकृपापात्र हैं।


आप पूज्य महंत (श्रीनीलकंठेश्वर महादेव-वैष्णव माता मंदिर, संत आश्रम महानगर, लखनऊ) हैं। आपने परंपरागत शास्त्रों के अध्ययन उपरांत जूना अखाड़े से संन्यास ग्रहण कर वर्तमान में पूज्य महंत हैं। आप मण्डल के संरक्षक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी हैं।

आप पुरीपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामीश्री निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के दीक्षित शिष्य हैं। आप साधक, लेखक और विचारक हैं। धर्म-अध्यात्म, संस्कृति और राष्ट्र के संदर्भ में आपका गहन अध्ययन और चिंतन है। आप मण्डल के प्रमुखमार्गदर्शक हैं।
[ ध्येय ]
आचार्यशंकर भारतोद्भासक मण्डल भगवत्पाद आदिशंकराचार्य भगवान को प्रेरणा स्रोत मानकर शास्त्रोक्त धर्म के प्रचार प्रसार में संलग्न है। हिंदू धर्म के सभी अंगभूत घटकों पर यथारूप आस्था रखते हुये सभी के व्यवहारिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक पहलुओं को प्रकट करने में संलग्न है। सत्य सनातन वैदिक आर्य हिंदू धर्म के शास्त्रीय स्वरूप की सर्वत्र स्थापना ही मंडल का ध्येय है। सनातन धर्म का आधार वर्णाश्रम है अतः वर्णाश्रम की मर्यादा का सर्वतोभावेन रक्षा करना मण्डल का परमकर्तव्य है। सनातन धर्म के सभी वैदिक संप्रदायों का सम्मान और सभी का समन्वय, संप्रदाय विशेष में कालक्रम से उत्पन्न विकृतियों का शमन आदि हमारा उद्देश्य है। परब्रह्म के कार्यविशेष से पाँच ब्रह्मस्वरूप देवों (श्री विष्णु, श्री शिव, श्रीदुर्गा, श्री गणेश, श्री सूर्य) में समान आस्था और उनकी भक्ति का प्रचार प्रसार करना भी हमारा ध्येय है।
संरक्षक, मार्गदर्शक एवं कार्यकारी व्यवस्था — शास्त्रीय मार्गदर्शन में संगठनात्मक सेवा।
[ मुख्य कार्यपालक अधिकारी ]
पीठाधीश्वर श्रीनीलकंठेश्वर महादेव — वैष्णव माता मंदिर, संत आश्रम, महानगर · लखनऊ
UNIT / SRK
प्रमुख
पूज्य आचार्यश्री रामशंकर शुक्ल जी
UNIT / MRG
प्रमुख
श्री रामबाबू पाण्डेय जी
कार्यकारी पटल
कार्यकारी अध्यक्ष
03कार्यकारी उपाध्यक्ष
04महासचिव
05सचिव
06कोषाध्यक्ष
07संपर्क प्रमुख
08प्रचार विभाग
09अभिलेख विभाग
10धर्म · रक्षा · अर्थ · सेवा · श्री · सुरभि · हनुमत · न्याय
धर्म प्रकल्प
P-01ज्ञान प्रकल्प
P-02रक्षा प्रकल्प
P-03अर्थ प्रकल्प
P-04सेवा प्रकल्प
P-05श्रीप्रकल्प
P-06हनुमत प्रकल्प
P-07सुरभि प्रकल्प
P-08शांकर न्याय सेना
P-09केंद्रीय सदस्य

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